Wednesday, November 6, 2013
charoli
जरी जाणिवांचा जीवाला दिलासा
असा कसा रे उन्हाळी रंग होतो पावसाचा
तिच्यासाठी की तिच्याशिवाय
निळ्याभोर आभाळाचा चल एक तुकडा उधार मागु
सुना है यही किसी चौखटसे रोज जनाजें निकलते हैं..ख्वाबोंके..
किती क्षणांचे किती मणांचे किती अनावर नाते
पैलतीराचा नाद तुझा अन् एैलतीराचे बंध
ओळखीच्या उन्हांची सावली अनोळखी
शांत कर आता तुझ्या मशाली
Wednesday, June 26, 2013
दोन दोन ओळी
मरण्याच्या लाख इच्छा जगण्याला कारण नाही
ओंजळभर सुखास येथे वेड्या दुख:हि तारण नाही
विरू दे जरा उसासे उध्वस्त त्या क्षणांचे
फिरुनी वसेल तेथे बघ गाव नव्या स्वप्नांचे
न भटक ए राही खामखा इस खुदी के तलाश मे
सुना है बडी खौफनाक दिखती है जिंदगी आईनेमे
न खोज ए परिंदे इस भीड कि धडकने
मुर्दोन्का शहर ये यहा बिकती है सांसे
कूछ भी तो नही बदला है यहा
फिर भी अंजान लगता है
.....यह शहर...
आकाशीचा चंद्रमा कधी येईल का गं अंगणी ?
रातराणीच्या गंधासवे कधी मोहोरेल गं चांदणी?
घडु दे आता नव्याने संवाद मीपणाशी
लागु दे संदर्भ काळाचे ह्या गोठलेल्या मौनाशी
बेवजह हि बदनाम शहर कि वो रंगीन गलीया
बेनाम रिश्तोको अंजाम देती है वो अंधेरी गलीया
ओंजळभर सुखास येथे वेड्या दुख:हि तारण नाही
विरू दे जरा उसासे उध्वस्त त्या क्षणांचे
फिरुनी वसेल तेथे बघ गाव नव्या स्वप्नांचे
न भटक ए राही खामखा इस खुदी के तलाश मे
सुना है बडी खौफनाक दिखती है जिंदगी आईनेमे
न खोज ए परिंदे इस भीड कि धडकने
मुर्दोन्का शहर ये यहा बिकती है सांसे
कूछ भी तो नही बदला है यहा
फिर भी अंजान लगता है
.....यह शहर...
आकाशीचा चंद्रमा कधी येईल का गं अंगणी ?
रातराणीच्या गंधासवे कधी मोहोरेल गं चांदणी?
घडु दे आता नव्याने संवाद मीपणाशी
लागु दे संदर्भ काळाचे ह्या गोठलेल्या मौनाशी
बेवजह हि बदनाम शहर कि वो रंगीन गलीया
बेनाम रिश्तोको अंजाम देती है वो अंधेरी गलीया
चारोळ्या
मुष्कील ही नहीं,नामुमकीनसा लगता है दिल का धडकना कभी..
भीड तो बहाना बस, खुदी की तलाश में भटकती हैं खामोश सांसे कभी..
ऐन मृत्युघटकेला पुन्हा,जीव हवासा वाटतो
मिटल्या पापणीआडचा तोच,गतजन्म नवासा वाटतो
मिटल्या पापणीआडचा तोच,गतजन्म नवासा वाटतो
यही किसी मोड पे कही संभल के रखी थी जिंदगी
रोज पुरवून पुरवून वापरायची असं कधीचं ठरलं होतं
जरी चार पावलांचाच
होता प्रवास अवघा
प्रत्येक श्वासाचा तरीही
इथे सोहळा होतो
न धडक बेवजह ए दिल उसके आने की कोइ आहट नहीं
खुले दरवाजेसे बस ताकती है परछाईया अंधेरेसे कोई मिलता नहीं
बडे चावसे हर चौराहे पे आजकल बिकती है उम्मीदे
कल की हि पुरानी,बासी फिर भी रोज नईसी उम्मीदे
सुना है, बिगडी तकदीर भी सिने से लिपट जाती है कभी ...
थमेसे दिल कि धडकने क्या उसे भी सुनाई देती है?
कडी धूप मे जब साये साथ छोड जाते है...
भरी भीड मे जब तन्हाई छु जाती है..
अंधेरा तब मेहसूस होता है...
आगे जाने का डर जब अतीत में खिचता है...
थमीसी धडकनो के बीच दौडती रुह
जब जिंदा होने का सबूत मांगती है
अंधेरा तब मेहसूस होता है...
पैगाम तो कई भेजे खुदा ने...
बंदा जिंदगी मे मश्गुल था...
समझी ये दुनियादारी जब
आंखोमे बस उसीका इंतजार था..
मन गढूळ गढूळ
घेई शोध अंधारचा
चमचमत्या पाणवठ्यावर
त्यास भास काजव्यांचा
रोज पुरवून पुरवून वापरायची असं कधीचं ठरलं होतं
जरी चार पावलांचाच
होता प्रवास अवघा
प्रत्येक श्वासाचा तरीही
इथे सोहळा होतो
न धडक बेवजह ए दिल उसके आने की कोइ आहट नहीं
खुले दरवाजेसे बस ताकती है परछाईया अंधेरेसे कोई मिलता नहीं
बडे चावसे हर चौराहे पे आजकल बिकती है उम्मीदे
कल की हि पुरानी,बासी फिर भी रोज नईसी उम्मीदे
सुना है, बिगडी तकदीर भी सिने से लिपट जाती है कभी ...
थमेसे दिल कि धडकने क्या उसे भी सुनाई देती है?
कडी धूप मे जब साये साथ छोड जाते है...
भरी भीड मे जब तन्हाई छु जाती है..
अंधेरा तब मेहसूस होता है...
आगे जाने का डर जब अतीत में खिचता है...
थमीसी धडकनो के बीच दौडती रुह
जब जिंदा होने का सबूत मांगती है
अंधेरा तब मेहसूस होता है...
पैगाम तो कई भेजे खुदा ने...
बंदा जिंदगी मे मश्गुल था...
समझी ये दुनियादारी जब
आंखोमे बस उसीका इंतजार था..
मन गढूळ गढूळ
घेई शोध अंधारचा
चमचमत्या पाणवठ्यावर
त्यास भास काजव्यांचा
Friday, June 14, 2013
पाणावलेला पाउस
पाउस म्हणजे,
चिंब ओली माती,
इंद्रधनुच्या रंगामध्ये
चमचमणारं पाणी
पाउस म्हणजे...
गळकं छप्पर, शेवाळलेल्या भींती
वीजांच्या प्रकाशात
लख्ख उजळलेली भीती
पाउस म्हणजे
झिम्माड... ओला ओघ
रिमझिमणार्या आठवांचा
हवाहवासा मेघ..
पाउस म्हणजे
चिखल..भांबावलेल्या जगण्याचा
नकोनकोश्या भूतकाळामधे
घुटमळणार्या वर्तमानाचा..
पाणावलेल्या डोळ्यांचा पावसाळी वस्तीतला पाउस...
Friday, March 22, 2013
उंबरठ्याच्या गावांची तशी वेगळीच मजा असते
प्रत्येकच वळणाला इथे चौकटीची भीती असते
----------------------------------------------
वेळुच्या रानातुन घुमती अवचित हळवे सुर
आठवणीच्या हिंदोळ्यांवर तेव्हा धपापतो रे जीव
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येशीलहि धावून कृष्णा तू कृष्णेच्या एका हाकेसरशी
लाजेच्या दरबारात सांग फक्त तिने हाकारावे रे कधी
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तुझ्यापरी तुझाच तो हट्ट ग कितीसा
निरोपाच्या वळणालाही तुझ्या परतण्याचा भरोसा
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कुठे तुझी सुरुवात अन बघ कुठे अंत
होरपळणाऱ्या जीवाला का रे फरफटण्याची खंत
---------------------------------------------------
मनमनास उमगत जाती नात्यांच्या निरगाठी...
बावरल्या क्षणांना प्रश्न तरी हि हुरहूर कोणासाठी...
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झाकोळल्या चंद्राला करे लख्ख चांदनी एक सवाल
पुनवेचा राजा तू का रे हर अवसेला असा मवाळ
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प्रत्येकच वळणाला इथे चौकटीची भीती असते
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वेळुच्या रानातुन घुमती अवचित हळवे सुर
आठवणीच्या हिंदोळ्यांवर तेव्हा धपापतो रे जीव
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येशीलहि धावून कृष्णा तू कृष्णेच्या एका हाकेसरशी
लाजेच्या दरबारात सांग फक्त तिने हाकारावे रे कधी
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तुझ्यापरी तुझाच तो हट्ट ग कितीसा
निरोपाच्या वळणालाही तुझ्या परतण्याचा भरोसा
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कुठे तुझी सुरुवात अन बघ कुठे अंत
होरपळणाऱ्या जीवाला का रे फरफटण्याची खंत
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मनमनास उमगत जाती नात्यांच्या निरगाठी...
बावरल्या क्षणांना प्रश्न तरी हि हुरहूर कोणासाठी...
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झाकोळल्या चंद्राला करे लख्ख चांदनी एक सवाल
पुनवेचा राजा तू का रे हर अवसेला असा मवाळ
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इतना भी न आजमा इस हार को ए जिंदगी
के जीतके जश्नने से हमे यु खौफासा लगने लगे
-------------------------------------------------
असावी त्यालाही बहुदा माणसांची शिवाशिव
लांबूनच न्याहाळतो सार आभाळातून देवबिव..
-------------------------------------------------
तुझ्या सुरांनी भारून जावी वार्यावरची गाणी
खुल्या आसमंती लहरत जावी मनामनातील गाणी
-------------------------------------------------
चिमुरड्या मुठीत उमलणारी पोतभर स्वप्न
आभाळाशी नात सांगणारी नवजात स्वप्न
-------------------------------------------
कुछ इस तरह चुभते अपने, गैरोके इस मुल्क मे
के भीड के चेहरे पे भी अब खौफसा दिखता है
-----------------------------------------
हातभर ओंजळीत विसावलय वितभर आभाळ
कोर कोर चंद्र मिरवतय निळ्या नदीच कपाळ
--------------------------------------------
इक मोड पे युही बदल गयी जिंदगी
उल्झानो के दायारोमे बस सिमट गयी जिंदगी
-----------------------------------------
नकळत उमगत जाते मुक्या थेंबांची बोलकी भाषा
कधी अंतरांची रुजवात तर कधी अर्थ शेवटचा
-------------------------------------------------
कुठे तुझी सुरुवात अन कुठे तुझा अंत
माणसाचा जन्म परी तुला माणुसकीची भ्रांत
-------------------------------------------------
मनमनात अवघडलेला तो ओलाचिंब कोपरा
क्षणक्षणास मोह ज्याचा तो दरवळ्लेला कोपरा
--------------------------------------------------
बेनाम हि रहने दो हमे इस रिश्तो के भवर मे
के दिवानगी का हर चेहरा यहा बदनामसा लगता है
के जीतके जश्नने से हमे यु खौफासा लगने लगे
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असावी त्यालाही बहुदा माणसांची शिवाशिव
लांबूनच न्याहाळतो सार आभाळातून देवबिव..
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तुझ्या सुरांनी भारून जावी वार्यावरची गाणी
खुल्या आसमंती लहरत जावी मनामनातील गाणी
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चिमुरड्या मुठीत उमलणारी पोतभर स्वप्न
आभाळाशी नात सांगणारी नवजात स्वप्न
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कुछ इस तरह चुभते अपने, गैरोके इस मुल्क मे
के भीड के चेहरे पे भी अब खौफसा दिखता है
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हातभर ओंजळीत विसावलय वितभर आभाळ
कोर कोर चंद्र मिरवतय निळ्या नदीच कपाळ
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इक मोड पे युही बदल गयी जिंदगी
उल्झानो के दायारोमे बस सिमट गयी जिंदगी
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नकळत उमगत जाते मुक्या थेंबांची बोलकी भाषा
कधी अंतरांची रुजवात तर कधी अर्थ शेवटचा
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कुठे तुझी सुरुवात अन कुठे तुझा अंत
माणसाचा जन्म परी तुला माणुसकीची भ्रांत
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मनमनात अवघडलेला तो ओलाचिंब कोपरा
क्षणक्षणास मोह ज्याचा तो दरवळ्लेला कोपरा
--------------------------------------------------
बेनाम हि रहने दो हमे इस रिश्तो के भवर मे
के दिवानगी का हर चेहरा यहा बदनामसा लगता है
पडझडीचे अवशेष सारे मनातच विरघळू दे
ऐलतीराचा पैल तीराशी संवाद नव्याने होऊ दे
----------------------------------------------
सुख झाले अळणी देवा दु:खाची तू चिमुट दे
साजर्या जगण्यास माझ्या तू काजळाची तीट दे
-----------------------------------------------
नाही वीज नाही ढग झाला पोरका पाउस..
उंबर्यात अनाथ मरणाच्या झाला गर्भार पाउस ...
-----------------------------------------------
कुजबुजत्या नजरांतले
असंख्य शापित प्रश्न
नाकारलेली उत्तर
अन काळ, काम, वेगाच्या गणितात
मांडलेले ठोकताळे..
.
.
.
.
पांढर्या कपाळाच्या तारुण्याच
मातृत्व अस काळकुट्ट का?
--------------------------------------------------
भेगाळलेली रे धरती ओसाडले माळरान
थेंब थेंब पाण्यासाठी जीव पडतो गहाण
-----------------------------------------------------
तळ्व्याएवढ्या काळजाला , काळजी आभाळाच
असेल का रे त्यालाही ,खंत मावळ्ण्याची?
--------------------------------------------------
मुठीत बंद आभाळ
पिंजर्यात कैद वारा
हिरवागार वणवा
अन मृगजळाची तहान..
....
....
असाच काहीबाही बडबडायची म्हणे 'ती'..स्वप्नात..
....
...
८५% जळलेल्या 'ती'च्या सासरच्या डोळ्यात
झळकत होता स्पष्ट सुटकेचा निश्वास...
----------------------------------------
ऐलतीराचा पैल तीराशी संवाद नव्याने होऊ दे
----------------------------------------------
सुख झाले अळणी देवा दु:खाची तू चिमुट दे
साजर्या जगण्यास माझ्या तू काजळाची तीट दे
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नाही वीज नाही ढग झाला पोरका पाउस..
उंबर्यात अनाथ मरणाच्या झाला गर्भार पाउस ...
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कुजबुजत्या नजरांतले
असंख्य शापित प्रश्न
नाकारलेली उत्तर
अन काळ, काम, वेगाच्या गणितात
मांडलेले ठोकताळे..
.
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.
.
पांढर्या कपाळाच्या तारुण्याच
मातृत्व अस काळकुट्ट का?
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भेगाळलेली रे धरती ओसाडले माळरान
थेंब थेंब पाण्यासाठी जीव पडतो गहाण
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तळ्व्याएवढ्या काळजाला , काळजी आभाळाच
असेल का रे त्यालाही ,खंत मावळ्ण्याची?
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मुठीत बंद आभाळ
पिंजर्यात कैद वारा
हिरवागार वणवा
अन मृगजळाची तहान..
....
....
असाच काहीबाही बडबडायची म्हणे 'ती'..स्वप्नात..
....
...
८५% जळलेल्या 'ती'च्या सासरच्या डोळ्यात
झळकत होता स्पष्ट सुटकेचा निश्वास...
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Sunday, January 6, 2013
मुठीत इवली स्वप्न अन खर्या जगण्याचं व्याज
एक पावसाळी रात्र काल ठेवली गहाण
-------------------------------------------------
वरवर बघता दिसतीलहि येथे सप्तरंगी मुखवटे सुखाचे
जमेल ना देवा तुलाही लपवणे ओघळ असे दु:खाचे..
-------------------------------------------------
जाण्यार्याला अस पाठमोर टोकू नये ग ...
भरल्या घरात कशाच ग इतक रडू ?
संध्याकाळ अशी उदास नसावी ग ...
देवी तथास्तु म्हणत फिरते बघ घराघरातुन ..
लहानपणी आजी सांगायची अस काही बाही ...
....खर खोट देव जाने .....
..मोठ होता होता सगळच विसरायला झालय आताशा..
जाऊदे जे होत ते भल्यासाठीच...
(हे पण आजीनेच सांगितलय न)
-----------------------------------------
येता येता त्या क्षणाने असहि यावे
जुन्याच दोघांना दुनियेने नव्या नात्याने ओळखावे-
------------------------------------------------
आधार सावल्यांचे असू दे तुझ्या उशाशी
काळ्या रात्रीत उफाळते वैर त्या प्रश्नांचे ह्या उत्तरांशी
--------------------------------------------
होती तशी ठाऊक मजला
कथा अवघड वळणांची
सरळ सोटं मार्ग जगण्याचा
तरी मना बोच व्यथेची
--------------------------------------------
बदलांचे वारे सुरु झालेत...
सोसण्याचे बळ दे...
बदलताहेत नात्यांच्या परिभाषा.
.मनाला सावरण्याचे भान दे
एक पावसाळी रात्र काल ठेवली गहाण
-------------------------------------------------
वरवर बघता दिसतीलहि येथे सप्तरंगी मुखवटे सुखाचे
जमेल ना देवा तुलाही लपवणे ओघळ असे दु:खाचे..
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जाण्यार्याला अस पाठमोर टोकू नये ग ...
भरल्या घरात कशाच ग इतक रडू ?
संध्याकाळ अशी उदास नसावी ग ...
देवी तथास्तु म्हणत फिरते बघ घराघरातुन ..
लहानपणी आजी सांगायची अस काही बाही ...
....खर खोट देव जाने .....
..मोठ होता होता सगळच विसरायला झालय आताशा..
जाऊदे जे होत ते भल्यासाठीच...
(हे पण आजीनेच सांगितलय न)
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येता येता त्या क्षणाने असहि यावे
जुन्याच दोघांना दुनियेने नव्या नात्याने ओळखावे-
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आधार सावल्यांचे असू दे तुझ्या उशाशी
काळ्या रात्रीत उफाळते वैर त्या प्रश्नांचे ह्या उत्तरांशी
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होती तशी ठाऊक मजला
कथा अवघड वळणांची
सरळ सोटं मार्ग जगण्याचा
तरी मना बोच व्यथेची
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बदलांचे वारे सुरु झालेत...
सोसण्याचे बळ दे...
बदलताहेत नात्यांच्या परिभाषा.
.मनाला सावरण्याचे भान दे
उध्वस्त वादळांच्या खुणा मिरवणारे किनारे
फुटक्या लाटांची लक्तरे कवटाळणारे किनारे
क्षितीजाच्या उंबरठ्याशी हुरहुरती घालमेल
विझणार्या दिवसालाही असे जागवणारे किनारे
वाहावत जाणाऱ्या स्वप्नात ध्येयांचे मृगजळ
प्रयत्नांच्या रस्त्यांना लाभले जिद्दीचे किनारे..
-----------------------------------------------------
किती सांग शिल्लक देवा गुन्हे स्त्रीधर्माचे
करावे का रे आतातरी हिशोब गर्भातल्या मरणाचे..
----------------------------------------------------
वरवर बघता दिसतीलहि येथे सप्तरंगी मुखवटे सुखाचे
जमेल ना देवा तुलाही लपवणे ओघळ असे दु:खाचे..
---------------------------------------------------
रोजच्यासारखीच रोजची नवीकोरी सुरुवात
नवलाईच्या आशेने नव्या ध्येयाची रुजवात...
फुटक्या लाटांची लक्तरे कवटाळणारे किनारे
क्षितीजाच्या उंबरठ्याशी हुरहुरती घालमेल
विझणार्या दिवसालाही असे जागवणारे किनारे
वाहावत जाणाऱ्या स्वप्नात ध्येयांचे मृगजळ
प्रयत्नांच्या रस्त्यांना लाभले जिद्दीचे किनारे..
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किती सांग शिल्लक देवा गुन्हे स्त्रीधर्माचे
करावे का रे आतातरी हिशोब गर्भातल्या मरणाचे..
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वरवर बघता दिसतीलहि येथे सप्तरंगी मुखवटे सुखाचे
जमेल ना देवा तुलाही लपवणे ओघळ असे दु:खाचे..
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रोजच्यासारखीच रोजची नवीकोरी सुरुवात
नवलाईच्या आशेने नव्या ध्येयाची रुजवात...
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सैरभैर जीव अन हूरहूरता हरेक ठोका..
झाकोळलेल्या सांजेला धूसर ध्येयवाट...
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किती वादळांचा सांग किनार्या तुला ठाव
लाटांचा विळखा पायी तरी कसा तुझा अलिप्ततेचा भाव
लाटांचा विळखा पायी तरी कसा तुझा अलिप्ततेचा भाव
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पुन्हा एकदा कोसळताना तुझा आव सावरण्याचा
सवयीचाच होत जातो मग रस्ता भरकट्ण्याचा
उठता रान चाहुलींचे , मनी हुरहुरते वादळ
ओझरत्या स्पर्शालाही उगा भास मोहरण्याचा
जुन्याच बुरसट्ल्या मुखवट्याआडची अदृश्य हळवी घुसमट
रेंगाळत्या नशिबाला लागतो म्हणे आताशा वेध शेवटाचा
सवयीचाच होत जातो मग रस्ता भरकट्ण्याचा
उठता रान चाहुलींचे , मनी हुरहुरते वादळ
ओझरत्या स्पर्शालाही उगा भास मोहरण्याचा
जुन्याच बुरसट्ल्या मुखवट्याआडची अदृश्य हळवी घुसमट
रेंगाळत्या नशिबाला लागतो म्हणे आताशा वेध शेवटाचा
---------------------------------------------------------
कधी मीच माझा होऊन श्वास
लपते मनाच्या तळ्यात खोलवर
तीच ती घालमेल श्वासांची उघडीप
टाळती प्रश्न उगा कोरडे निश्वास
लपते मनाच्या तळ्यात खोलवर
तीच ती घालमेल श्वासांची उघडीप
टाळती प्रश्न उगा कोरडे निश्वास
------------------------------------------------
कुठवर सांभाळायचे सांग हे दाखले अस्तित्वाचे
वळता पाठ विरत जाती पुसत ठसे आठवणींचे
वळता पाठ विरत जाती पुसत ठसे आठवणींचे
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जरी वेगळाली तुझी भाषा तुझा वेश ,
आडवाटेवर ओळखीचे तुझ्या पावलांचे भास...
आडवाटेवर ओळखीचे तुझ्या पावलांचे भास...
मनमनास ठाऊक अवघ्या दिशा वादळांच्या
कासावीस जीव तरी शोधे चोरवाटा भरकटण्याच्या....
-------------------------------------------------शोध मीपणाचा आजन्म पुरलेला
सावल्यांच्या दिशांचाही इथे अंदाज चुकलेला
------------------------------------------------क्षितिजाच्या उंबरठ्याशी तळव्यात तेजाचे दान
मिणमिणत्या सावल्यानाही गर्द काळोखाचे भान
-----------------------------------------------
मन उनाड उनाड
घेई शोध अस्तित्वाचा
पावलापावलावर अवघडलेल्या
ह्या वाटा भरकटण्याच्या
-----------------------------
घे आडोश्याला जरासे तू हे पसारे वेदनेचे
उठतील चहूदिशांनी बघ आता मोहोळ सांत्वनांचे
-------------------------------------------------
उठता रान चाहुलींचे , मनी हुरहुरते वादळ
ओझरत्या स्पर्शालाही उगा भास मोहरण्याचा
------------------------------------------------
रात्रीच्या गर्भातली प्रकाशाची रुजवण तू
अवसेच्या रानातली जणू काजव्यांची माळ तू..
-----------------------------------------------
मौनाच्या वेदनेतला हूळहूळता हुंकार तू
ओरखड्यांच्या नक्षीतला कधी तृप्ततेचा ओघळ तू
--------------------------------------------------
स्वप्न अन सत्यातला खराखुरा आभास तू
घट्ट मिठीत काळाच्या सुटकेचा निश्वास तू...
----------------------------------------------------
कासावीस जीव तरी शोधे चोरवाटा भरकटण्याच्या....
-------------------------------------------------शोध मीपणाचा आजन्म पुरलेला
सावल्यांच्या दिशांचाही इथे अंदाज चुकलेला
------------------------------------------------क्षितिजाच्या उंबरठ्याशी तळव्यात तेजाचे दान
मिणमिणत्या सावल्यानाही गर्द काळोखाचे भान
-----------------------------------------------
मन उनाड उनाड
घेई शोध अस्तित्वाचा
पावलापावलावर अवघडलेल्या
ह्या वाटा भरकटण्याच्या
-----------------------------
घे आडोश्याला जरासे तू हे पसारे वेदनेचे
उठतील चहूदिशांनी बघ आता मोहोळ सांत्वनांचे
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उठता रान चाहुलींचे , मनी हुरहुरते वादळ
ओझरत्या स्पर्शालाही उगा भास मोहरण्याचा
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रात्रीच्या गर्भातली प्रकाशाची रुजवण तू
अवसेच्या रानातली जणू काजव्यांची माळ तू..
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मौनाच्या वेदनेतला हूळहूळता हुंकार तू
ओरखड्यांच्या नक्षीतला कधी तृप्ततेचा ओघळ तू
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स्वप्न अन सत्यातला खराखुरा आभास तू
घट्ट मिठीत काळाच्या सुटकेचा निश्वास तू...
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