Friday, March 22, 2013

उंबरठ्याच्या गावांची तशी वेगळीच मजा असते
प्रत्येकच वळणाला इथे चौकटीची भीती असते
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वेळुच्या रानातुन घुमती अवचित हळवे सुर
आठवणीच्या हिंदोळ्यांवर तेव्हा धपापतो रे जीव
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येशीलहि धावून कृष्णा तू कृष्णेच्या एका हाकेसरशी 
लाजेच्या दरबारात सांग फक्त तिने हाकारावे रे कधी
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तुझ्यापरी तुझाच तो हट्ट ग कितीसा
निरोपाच्या वळणालाही तुझ्या परतण्याचा भरोसा
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कुठे तुझी सुरुवात अन बघ कुठे अंत 
होरपळणाऱ्या जीवाला का रे फरफटण्याची खंत
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मनमनास उमगत जाती नात्यांच्या निरगाठी...
बावरल्या क्षणांना प्रश्न तरी हि हुरहूर कोणासाठी...
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झाकोळल्या चंद्राला करे लख्ख चांदनी एक सवाल 
पुनवेचा राजा तू का रे हर अवसेला असा मवाळ
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