Sunday, January 6, 2013

मुठीत इवली स्वप्न अन खर्या जगण्याचं व्याज
एक पावसाळी रात्र काल ठेवली गहाण
-------------------------------------------------
वरवर बघता दिसतीलहि येथे सप्तरंगी मुखवटे सुखाचे 
जमेल ना देवा तुलाही लपवणे ओघळ असे दु:खाचे..
-------------------------------------------------
जाण्यार्याला अस पाठमोर टोकू नये ग ... 
भरल्या घरात कशाच ग इतक रडू ?
संध्याकाळ अशी उदास नसावी ग ...
देवी तथास्तु म्हणत फिरते बघ घराघरातुन ..
लहानपणी आजी सांगायची अस काही बाही ... 
....खर खोट देव जाने .....
..मोठ होता होता सगळच विसरायला झालय आताशा.. 
जाऊदे जे होत ते भल्यासाठीच... 
(हे पण आजीनेच सांगितलय न)
-----------------------------------------
येता येता त्या क्षणाने असहि यावे 
जुन्याच दोघांना दुनियेने नव्या नात्याने ओळखावे-
------------------------------------------------
आधार सावल्यांचे असू दे तुझ्या उशाशी 
काळ्या रात्रीत उफाळते वैर त्या प्रश्नांचे ह्या उत्तरांशी
--------------------------------------------
होती तशी ठाऊक मजला
कथा अवघड वळणांची
सरळ सोटं मार्ग जगण्याचा
तरी मना बोच व्यथेची
--------------------------------------------
बदलांचे वारे सुरु झालेत... 
सोसण्याचे बळ दे...
 बदलताहेत नात्यांच्या परिभाषा.
.मनाला सावरण्याचे भान दे
उध्वस्त वादळांच्या खुणा मिरवणारे किनारे 
फुटक्या लाटांची लक्तरे कवटाळणारे किनारे 

क्षितीजाच्या उंबरठ्याशी हुरहुरती घालमेल 
विझणार्या दिवसालाही असे जागवणारे किनारे

वाहावत जाणाऱ्या स्वप्नात ध्येयांचे मृगजळ 
प्रयत्नांच्या रस्त्यांना लाभले जिद्दीचे किनारे..
-----------------------------------------------------
किती सांग शिल्लक देवा गुन्हे स्त्रीधर्माचे 
करावे का रे आतातरी हिशोब गर्भातल्या मरणाचे..
----------------------------------------------------
वरवर बघता दिसतीलहि येथे सप्तरंगी मुखवटे सुखाचे 
जमेल ना देवा तुलाही लपवणे ओघळ असे दु:खाचे..
---------------------------------------------------
रोजच्यासारखीच रोजची नवीकोरी सुरुवात
नवलाईच्या आशेने नव्या ध्येयाची रुजवात...
-----------------------------------------------------
सैरभैर जीव अन हूरहूरता हरेक ठोका..
झाकोळलेल्या सांजेला धूसर ध्येयवाट...
---------------------------------------------------
किती वादळांचा सांग किनार्या तुला ठाव 
लाटांचा विळखा पायी तरी कसा तुझा अलिप्ततेचा भाव
---------------------------------------------------
पुन्हा एकदा कोसळताना तुझा आव सावरण्याचा 
सवयीचाच होत जातो मग रस्ता भरकट्ण्याचा

उठता रान चाहुलींचे , मनी हुरहुरते वादळ 
ओझरत्या स्पर्शालाही उगा भास मोहरण्याचा 

जुन्याच बुरसट्ल्या मुखवट्याआडची अदृश्य हळवी घुसमट 
रेंगाळत्या नशिबाला लागतो म्हणे आताशा वेध शेवटाचा
---------------------------------------------------------
कधी मीच माझा होऊन श्वास 
लपते मनाच्या तळ्यात खोलवर
तीच ती घालमेल श्वासांची उघडीप 
टाळती प्रश्न उगा कोरडे निश्वास
------------------------------------------------
कुठवर सांभाळायचे सांग हे दाखले अस्तित्वाचे 
वळता पाठ विरत जाती पुसत ठसे आठवणींचे
-------------------------------------------------
जरी वेगळाली तुझी भाषा तुझा वेश ,
आडवाटेवर ओळखीचे तुझ्या पावलांचे भास...

मनमनास ठाऊक अवघ्या दिशा वादळांच्या 
कासावीस जीव तरी शोधे चोरवाटा भरकटण्याच्या....

-------------------------------------------------
शोध मीपणाचा आजन्म पुरलेला
सावल्यांच्या दिशांचाही इथे अंदाज चुकलेला
------------------------------------------------
क्षितिजाच्या उंबरठ्याशी तळव्यात तेजाचे दान 
मिणमिणत्या सावल्यानाही गर्द काळोखाचे भान
-----------------------------------------------

मन उनाड उनाड 
घेई शोध अस्तित्वाचा 
पावलापावलावर अवघडलेल्या 
ह्या वाटा भरकटण्याच्या
-----------------------------
घे आडोश्याला जरासे तू हे पसारे वेदनेचे 
उठतील चहूदिशांनी बघ आता मोहोळ सांत्वनांचे
-------------------------------------------------
उठता रान चाहुलींचे , मनी हुरहुरते वादळ 
ओझरत्या स्पर्शालाही उगा भास मोहरण्याचा
------------------------------------------------
रात्रीच्या गर्भातली प्रकाशाची रुजवण तू 
अवसेच्या रानातली जणू काजव्यांची माळ तू..
-----------------------------------------------
मौनाच्या वेदनेतला हूळहूळता हुंकार तू 
ओरखड्यांच्या नक्षीतला कधी तृप्ततेचा ओघळ तू
--------------------------------------------------
स्वप्न अन सत्यातला खराखुरा आभास तू 
घट्ट मिठीत काळाच्या सुटकेचा निश्वास तू...
----------------------------------------------------