Friday, March 22, 2013

उंबरठ्याच्या गावांची तशी वेगळीच मजा असते
प्रत्येकच वळणाला इथे चौकटीची भीती असते
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वेळुच्या रानातुन घुमती अवचित हळवे सुर
आठवणीच्या हिंदोळ्यांवर तेव्हा धपापतो रे जीव
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येशीलहि धावून कृष्णा तू कृष्णेच्या एका हाकेसरशी 
लाजेच्या दरबारात सांग फक्त तिने हाकारावे रे कधी
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तुझ्यापरी तुझाच तो हट्ट ग कितीसा
निरोपाच्या वळणालाही तुझ्या परतण्याचा भरोसा
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कुठे तुझी सुरुवात अन बघ कुठे अंत 
होरपळणाऱ्या जीवाला का रे फरफटण्याची खंत
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मनमनास उमगत जाती नात्यांच्या निरगाठी...
बावरल्या क्षणांना प्रश्न तरी हि हुरहूर कोणासाठी...
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झाकोळल्या चंद्राला करे लख्ख चांदनी एक सवाल 
पुनवेचा राजा तू का रे हर अवसेला असा मवाळ
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इतना भी न आजमा इस हार को ए जिंदगी
के जीतके जश्नने से हमे यु खौफासा लगने लगे
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असावी त्यालाही बहुदा माणसांची शिवाशिव 
लांबूनच न्याहाळतो सार आभाळातून देवबिव..
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तुझ्या सुरांनी भारून जावी वार्यावरची गाणी 
खुल्या आसमंती लहरत जावी मनामनातील गाणी
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चिमुरड्या मुठीत उमलणारी पोतभर स्वप्न 
आभाळाशी नात सांगणारी नवजात स्वप्न
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कुछ इस तरह चुभते अपने, गैरोके इस मुल्क मे 
के भीड के चेहरे पे भी अब खौफसा दिखता है
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हातभर ओंजळीत विसावलय वितभर आभाळ 
कोर कोर चंद्र मिरवतय निळ्या नदीच कपाळ
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इक मोड पे युही बदल गयी जिंदगी
उल्झानो के दायारोमे बस सिमट गयी जिंदगी
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नकळत उमगत जाते मुक्या थेंबांची बोलकी भाषा 
कधी अंतरांची रुजवात तर कधी अर्थ शेवटचा
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कुठे तुझी सुरुवात अन कुठे तुझा अंत 
माणसाचा जन्म परी तुला माणुसकीची भ्रांत
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मनमनात अवघडलेला तो ओलाचिंब कोपरा
क्षणक्षणास मोह ज्याचा तो दरवळ्लेला कोपरा
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बेनाम हि रहने दो हमे इस रिश्तो के भवर मे
के दिवानगी का हर चेहरा यहा बदनामसा लगता है
पडझडीचे अवशेष सारे मनातच विरघळू दे 
ऐलतीराचा पैल तीराशी संवाद नव्याने होऊ दे
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सुख झाले अळणी देवा दु:खाची तू चिमुट दे
साजर्या जगण्यास माझ्या तू काजळाची तीट दे
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नाही वीज नाही ढग झाला पोरका पाउस..
उंबर्यात अनाथ मरणाच्या झाला गर्भार पाउस ...
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कुजबुजत्या नजरांतले 
असंख्य शापित प्रश्न
नाकारलेली उत्तर
अन काळ, काम, वेगाच्या गणितात 
मांडलेले ठोकताळे..
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पांढर्या कपाळाच्या तारुण्याच 
मातृत्व अस काळकुट्ट का?
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भेगाळलेली रे धरती ओसाडले माळरान
थेंब थेंब पाण्यासाठी जीव पडतो गहाण
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तळ्व्याएवढ्या काळजाला , काळजी आभाळाच 
असेल का रे त्यालाही ,खंत मावळ्ण्याची?
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मुठीत बंद आभाळ
पिंजर्यात कैद वारा 
हिरवागार वणवा 
अन मृगजळाची तहान..
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असाच काहीबाही बडबडायची म्हणे 'ती'..स्वप्नात..
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८५% जळलेल्या 'ती'च्या सासरच्या डोळ्यात 
झळकत होता स्पष्ट सुटकेचा निश्वास...
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