Friday, March 22, 2013

पडझडीचे अवशेष सारे मनातच विरघळू दे 
ऐलतीराचा पैल तीराशी संवाद नव्याने होऊ दे
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सुख झाले अळणी देवा दु:खाची तू चिमुट दे
साजर्या जगण्यास माझ्या तू काजळाची तीट दे
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नाही वीज नाही ढग झाला पोरका पाउस..
उंबर्यात अनाथ मरणाच्या झाला गर्भार पाउस ...
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कुजबुजत्या नजरांतले 
असंख्य शापित प्रश्न
नाकारलेली उत्तर
अन काळ, काम, वेगाच्या गणितात 
मांडलेले ठोकताळे..
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पांढर्या कपाळाच्या तारुण्याच 
मातृत्व अस काळकुट्ट का?
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भेगाळलेली रे धरती ओसाडले माळरान
थेंब थेंब पाण्यासाठी जीव पडतो गहाण
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तळ्व्याएवढ्या काळजाला , काळजी आभाळाच 
असेल का रे त्यालाही ,खंत मावळ्ण्याची?
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मुठीत बंद आभाळ
पिंजर्यात कैद वारा 
हिरवागार वणवा 
अन मृगजळाची तहान..
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असाच काहीबाही बडबडायची म्हणे 'ती'..स्वप्नात..
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८५% जळलेल्या 'ती'च्या सासरच्या डोळ्यात 
झळकत होता स्पष्ट सुटकेचा निश्वास...
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