Sunday, January 6, 2013

उध्वस्त वादळांच्या खुणा मिरवणारे किनारे 
फुटक्या लाटांची लक्तरे कवटाळणारे किनारे 

क्षितीजाच्या उंबरठ्याशी हुरहुरती घालमेल 
विझणार्या दिवसालाही असे जागवणारे किनारे

वाहावत जाणाऱ्या स्वप्नात ध्येयांचे मृगजळ 
प्रयत्नांच्या रस्त्यांना लाभले जिद्दीचे किनारे..
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किती सांग शिल्लक देवा गुन्हे स्त्रीधर्माचे 
करावे का रे आतातरी हिशोब गर्भातल्या मरणाचे..
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वरवर बघता दिसतीलहि येथे सप्तरंगी मुखवटे सुखाचे 
जमेल ना देवा तुलाही लपवणे ओघळ असे दु:खाचे..
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रोजच्यासारखीच रोजची नवीकोरी सुरुवात
नवलाईच्या आशेने नव्या ध्येयाची रुजवात...
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सैरभैर जीव अन हूरहूरता हरेक ठोका..
झाकोळलेल्या सांजेला धूसर ध्येयवाट...
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किती वादळांचा सांग किनार्या तुला ठाव 
लाटांचा विळखा पायी तरी कसा तुझा अलिप्ततेचा भाव
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पुन्हा एकदा कोसळताना तुझा आव सावरण्याचा 
सवयीचाच होत जातो मग रस्ता भरकट्ण्याचा

उठता रान चाहुलींचे , मनी हुरहुरते वादळ 
ओझरत्या स्पर्शालाही उगा भास मोहरण्याचा 

जुन्याच बुरसट्ल्या मुखवट्याआडची अदृश्य हळवी घुसमट 
रेंगाळत्या नशिबाला लागतो म्हणे आताशा वेध शेवटाचा
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कधी मीच माझा होऊन श्वास 
लपते मनाच्या तळ्यात खोलवर
तीच ती घालमेल श्वासांची उघडीप 
टाळती प्रश्न उगा कोरडे निश्वास
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कुठवर सांभाळायचे सांग हे दाखले अस्तित्वाचे 
वळता पाठ विरत जाती पुसत ठसे आठवणींचे
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जरी वेगळाली तुझी भाषा तुझा वेश ,
आडवाटेवर ओळखीचे तुझ्या पावलांचे भास...

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