Wednesday, June 26, 2013

चारोळ्या


मुष्कील ही नहीं,नामुमकीनसा लगता है दिल का धडकना कभी..
भीड तो बहाना बस, खुदी की तलाश में भटकती हैं खामोश सांसे कभी..

ऐन मृत्युघटकेला पुन्हा,जीव हवासा वाटतो
मिटल्या पापणीआडचा तोच,गतजन्म नवासा वाटतो

यही किसी मोड पे कही संभल के रखी थी जिंदगी
रोज पुरवून पुरवून वापरायची असं कधीचं ठरलं होतं

जरी चार पावलांचाच
होता प्रवास अवघा
प्रत्येक श्वासाचा तरीही
इथे सोहळा होतो

न धडक बेवजह ए दिल उसके आने की कोइ आहट नहीं
खुले दरवाजेसे बस ताकती है परछाईया अंधेरेसे कोई मिलता नहीं

बडे चावसे हर चौराहे पे आजकल बिकती है उम्मीदे
कल की हि पुरानी,बासी फिर भी रोज नईसी उम्मीदे

सुना है, बिगडी तकदीर भी सिने से लिपट जाती है कभी ...
थमेसे दिल कि धडकने क्या उसे भी सुनाई देती है?

कडी धूप मे जब साये साथ छोड जाते है... 
भरी भीड मे जब तन्हाई छु जाती है..
अंधेरा तब मेहसूस होता है... 
आगे जाने का डर जब अतीत में खिचता है... 
थमीसी धडकनो के बीच दौडती रुह 
जब जिंदा होने का सबूत मांगती है
अंधेरा तब मेहसूस होता है...

पैगाम तो कई भेजे खुदा ने... 
बंदा जिंदगी मे मश्गुल था...
समझी ये दुनियादारी जब
आंखोमे बस उसीका इंतजार था..

मन गढूळ गढूळ 
घेई शोध अंधारचा
चमचमत्या पाणवठ्यावर 
त्यास भास काजव्यांचा

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