Tuesday, February 18, 2014

charoli

जरा अनावर होता
जेव्हा बंध दरवळ होतो
चोरट्या त्या कटाक्षांचा
तेव्हा अवखळ बोभाटा होतो

ऐन सांजेच्या उंबर्यात ओढ उपरेपणाची
रात्रीच्या ओल्या गर्भात जाग वांझोट्या स्वप्नांची

निरोपाच्या वळणावरचे टाळलेले स्पर्श
हुरहुरत्या श्वासांच्या लयीत गंधाळलेले स्पर्श

कधी भैरवी कधी मारवा
सूर मनाचा सांगून जातो
ओंजळीत गंधाळलेले
कोवळे नाते देउन जातो

इतना भी कहां हम अपने खुदाको चाहते है
मौत की कगारपे तो उसके मुलाकात से डरते है

तेरे होने की जब आहट भी नहीं थीं
ए खुदा जिंदगी तब भी इतनी मुश्किल तो नहीं थीं

कई अरसों बाद बस्स मुलाकात हुई हैं खुदसे
एक पलमें कहाँ वैसे जिंदगी की तलाश खत्म होती हैं

खरं सांग शिल्लक किती देवा जुनी पाप पुण्य
नव्या प्राक्तनांना उगा जुन्याचे आता अडसर नको

किसकी बगावत हैं ये क्या पता ए खुदा
अजनबी भीड़ का चेहरा रोज आइने में जो दिखता हैं

लाख असतील गोठलेली स्वगते जरी मौनातली
हळव्या नाजूक हुंकाराची तरी सांग भाषांतरे केली कुणी

ना लख्ख प्रकाशाचा ना मिट्ट काळोखाचा असतो
खरा प्रश्न नेहमीच फक्त मिणमिणणारा असतो

Wednesday, November 6, 2013

charoli

जरी जाणिवांचा जीवाला दिलासा
तुझ्या आठवांचा आताशा भरोसा कुठे?

असा कसा रे उन्हाळी रंग होतो पावसाचा
काळ्याकुट्ट आभाळाच्या घुसमटीत का रे खेळ श्रावणाचा

तिच्यासाठी की तिच्याशिवाय
त्याने त्याचं खुशाल ठरवावं
जाता जाता वळून फक्त
"येतो गं" म्हणणं टाळावं

निळ्याभोर आभाळाचा चल एक तुकडा उधार मागु
अवघडलेल्या स्वप्नांसाठी एकदा हेही करून पाहू

सुना है यही किसी चौखटसे रोज जनाजें निकलते हैं..ख्वाबोंके..
वरना गली के मोडपे कोई यूही तो न रूकता..ख्वाब सस्तेमे बेचते..

किती क्षणांचे किती मणांचे किती अनावर नाते
जुन्या भेटीचे जुनेच धागे, नव्या अर्थास आतूर नाते

पैलतीराचा नाद तुझा अन् एैलतीराचे बंध
अधांतरी श्वासांस तुझ्या अवखळ मावळ गंध

ओळखीच्या उन्हांची सावली अनोळखी
एकजाती वेदनेची आर्तता अनोळखी

शांत कर आता तुझ्या मशाली
बघ पुरेसा हाही संहार झाला


Wednesday, June 26, 2013

दोन दोन ओळी

मरण्याच्या लाख इच्छा जगण्याला कारण नाही 
ओंजळभर सुखास येथे वेड्या दुख:हि तारण नाही

विरू दे जरा उसासे उध्वस्त त्या क्षणांचे 
फिरुनी वसेल तेथे बघ गाव नव्या स्वप्नांचे

न भटक ए राही खामखा इस खुदी के तलाश मे 
सुना है बडी खौफनाक दिखती है जिंदगी आईनेमे

न खोज ए परिंदे इस भीड कि धडकने
मुर्दोन्का शहर ये यहा बिकती है सांसे

कूछ भी तो नही बदला है यहा
फिर भी अंजान लगता है 
.....यह शहर...

आकाशीचा चंद्रमा कधी येईल का गं अंगणी ?
रातराणीच्या गंधासवे कधी मोहोरेल गं चांदणी?

घडु दे आता नव्याने संवाद मीपणाशी
लागु दे संदर्भ काळाचे ह्या गोठलेल्या मौनाशी

बेवजह हि बदनाम शहर कि वो रंगीन गलीया
बेनाम रिश्तोको अंजाम देती है वो अंधेरी गलीया

चारोळ्या


मुष्कील ही नहीं,नामुमकीनसा लगता है दिल का धडकना कभी..
भीड तो बहाना बस, खुदी की तलाश में भटकती हैं खामोश सांसे कभी..

ऐन मृत्युघटकेला पुन्हा,जीव हवासा वाटतो
मिटल्या पापणीआडचा तोच,गतजन्म नवासा वाटतो

यही किसी मोड पे कही संभल के रखी थी जिंदगी
रोज पुरवून पुरवून वापरायची असं कधीचं ठरलं होतं

जरी चार पावलांचाच
होता प्रवास अवघा
प्रत्येक श्वासाचा तरीही
इथे सोहळा होतो

न धडक बेवजह ए दिल उसके आने की कोइ आहट नहीं
खुले दरवाजेसे बस ताकती है परछाईया अंधेरेसे कोई मिलता नहीं

बडे चावसे हर चौराहे पे आजकल बिकती है उम्मीदे
कल की हि पुरानी,बासी फिर भी रोज नईसी उम्मीदे

सुना है, बिगडी तकदीर भी सिने से लिपट जाती है कभी ...
थमेसे दिल कि धडकने क्या उसे भी सुनाई देती है?

कडी धूप मे जब साये साथ छोड जाते है... 
भरी भीड मे जब तन्हाई छु जाती है..
अंधेरा तब मेहसूस होता है... 
आगे जाने का डर जब अतीत में खिचता है... 
थमीसी धडकनो के बीच दौडती रुह 
जब जिंदा होने का सबूत मांगती है
अंधेरा तब मेहसूस होता है...

पैगाम तो कई भेजे खुदा ने... 
बंदा जिंदगी मे मश्गुल था...
समझी ये दुनियादारी जब
आंखोमे बस उसीका इंतजार था..

मन गढूळ गढूळ 
घेई शोध अंधारचा
चमचमत्या पाणवठ्यावर 
त्यास भास काजव्यांचा

Friday, June 14, 2013

पाणावलेला पाउस

पाउस म्हणजे,
चिंब ओली माती,
इंद्रधनुच्या रंगामध्ये
चमचमणारं पाणी

पाउस म्हणजे...
गळकं छप्पर, शेवाळलेल्या भींती
वीजांच्या प्रकाशात
लख्ख उजळलेली  भीती

पाउस म्हणजे
झिम्माड... ओला ओघ
रिमझिमणार्या आठवांचा
हवाहवासा मेघ..

पाउस म्हणजे
चिखल..भांबावलेल्या जगण्याचा
नकोनकोश्या भूतकाळामधे
घुटमळणार्या वर्तमानाचा..

पाणावलेल्या डोळ्यांचा पावसाळी वस्तीतला पाउस...

Friday, March 22, 2013

उंबरठ्याच्या गावांची तशी वेगळीच मजा असते
प्रत्येकच वळणाला इथे चौकटीची भीती असते
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वेळुच्या रानातुन घुमती अवचित हळवे सुर
आठवणीच्या हिंदोळ्यांवर तेव्हा धपापतो रे जीव
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येशीलहि धावून कृष्णा तू कृष्णेच्या एका हाकेसरशी 
लाजेच्या दरबारात सांग फक्त तिने हाकारावे रे कधी
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तुझ्यापरी तुझाच तो हट्ट ग कितीसा
निरोपाच्या वळणालाही तुझ्या परतण्याचा भरोसा
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कुठे तुझी सुरुवात अन बघ कुठे अंत 
होरपळणाऱ्या जीवाला का रे फरफटण्याची खंत
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मनमनास उमगत जाती नात्यांच्या निरगाठी...
बावरल्या क्षणांना प्रश्न तरी हि हुरहूर कोणासाठी...
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झाकोळल्या चंद्राला करे लख्ख चांदनी एक सवाल 
पुनवेचा राजा तू का रे हर अवसेला असा मवाळ
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इतना भी न आजमा इस हार को ए जिंदगी
के जीतके जश्नने से हमे यु खौफासा लगने लगे
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असावी त्यालाही बहुदा माणसांची शिवाशिव 
लांबूनच न्याहाळतो सार आभाळातून देवबिव..
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तुझ्या सुरांनी भारून जावी वार्यावरची गाणी 
खुल्या आसमंती लहरत जावी मनामनातील गाणी
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चिमुरड्या मुठीत उमलणारी पोतभर स्वप्न 
आभाळाशी नात सांगणारी नवजात स्वप्न
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कुछ इस तरह चुभते अपने, गैरोके इस मुल्क मे 
के भीड के चेहरे पे भी अब खौफसा दिखता है
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हातभर ओंजळीत विसावलय वितभर आभाळ 
कोर कोर चंद्र मिरवतय निळ्या नदीच कपाळ
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इक मोड पे युही बदल गयी जिंदगी
उल्झानो के दायारोमे बस सिमट गयी जिंदगी
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नकळत उमगत जाते मुक्या थेंबांची बोलकी भाषा 
कधी अंतरांची रुजवात तर कधी अर्थ शेवटचा
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कुठे तुझी सुरुवात अन कुठे तुझा अंत 
माणसाचा जन्म परी तुला माणुसकीची भ्रांत
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मनमनात अवघडलेला तो ओलाचिंब कोपरा
क्षणक्षणास मोह ज्याचा तो दरवळ्लेला कोपरा
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बेनाम हि रहने दो हमे इस रिश्तो के भवर मे
के दिवानगी का हर चेहरा यहा बदनामसा लगता है