Sunday, October 21, 2012

वेड्यागत बहरत जावी
अनामिक नात्यांची ही वेल
भर वैशाखातही बरसुन जावी
जशी ओली श्रावणाची सर..
------------------------------
वेळुच्या रानातुन घुमते
गुढ सुरांची तान
जपल्या जीवाने तेथेच हरावे
अबोल चाहुलीचे भान..
------------------------------
विसरत चाललेय आताशा..
धाय मोकलुन रडणंही..
कोरड्या डोळ्यातच उमटते हल्ली
अनाम् अबोल घुसमटही
---------------------------
मनाचा मनाशी असा खेळ चाले 
चुकार हळव्या ठोक्यांचा इथे अर्थ लागे 
अनोळखी स्पर्शाची ती ओळखीची भाषा 
अन गंधओल्या श्वासांची मनी ओढ दाते
------------------------------
उरीच जपल्या जखमा
न बाजार मांडला मी कधी..
तिरपांगड्या तुझ्या संसाराचा
सांग मग तमाशा झाला कधी??

No comments:

Post a Comment